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आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक

नेपाल पोस्ट दैनिक
    September 23, 2019  मा प्रकाशित

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युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव ऐसे ही आध्यात्मिक चिकित्सक थे। मानवीय चेतना के सभी दृश्य- अदृश्य आयामों की मर्मज्ञता उन्हें हासिल थी। जब भी कोई उनके पास आता था, वह उसकी समस्याओं को बड़ी आसानी से समझ लेते थे। समस्याओं की समझ, उसके कारणों की खोज एवं इसके सार्थक समाधान में उन्हें कुछ ही मिनटों का समय लगता था। एक बार बातचीत के क्रम में उन्होंने कहा था- जब भी कोई मेरे पास अपनी समस्या लेकर आता है, मैं उसकी आँखों के माध्यम से उसकी अन्तर्चेतना में प्रविष्ट हो जाता हूँ। और उसकी समस्या के यथार्थ को जान लेता हूँ। उनकी इस बात पर जिज्ञासा करते हुए एक शिष्य ने कहा, गुरुदेव! आने वाला तो अपनी समस्या स्वयं ही आपको बता देता है। इसमें जानने की क्या जरूरत है।

इस शिष्य के कथन पर कुछ इस तरह से हँस पड़े जैसे कोई प्रौढ़ समझदार व्यक्ति किसी छोटे बच्चे की बात पर हँसता है। और वे हँसते हुए बोले, बेटा कम ही लोग मेरे पास सही बात बताते हैं। यानी वे झूठ बोलते हैं, अथवा फिर अपनी बातों को बढ़ा- चढ़ा कर कहते हैं। अथवा आधी- अधूरी बात कहते हैं। अब ऐसी बातों से तो काम चलता नहीं। इसलिए मुझे उनके अन्दर झांक कर सच्चाई जाननी पड़ती है। इस तरह से समस्या की सारी सच्चाई पता चल जाती है। साथ ही समाधान के सूत्र भी हाथ लग जाते हैं। सो कैसे? पूछने वाले की इस जिज्ञासा पर वह बोले- भगवान् का बनाया हुआ यह इन्सानी व्यक्तित्व भी बड़ा अजब- गजब है। इसकी गहरी परतों में न केवल समस्या की जड़ें होती हैं, बल्कि समाधान के सूत्र भी होते हैं। प्रायः ये समस्याएँ किसी पूर्वजन्म के कर्म, प्रारब्ध या संस्कार के कारण पनपती है। समाधान के रूप में बस इनकी थोड़ी सी आध्यात्मिक शल्यक्रिया करनी पड़ती है।

गुरुदेव की ये बातें भले ही थोड़ी रहस्यमय लगे, पर यह उनके जीवन के नित्यप्रति का सच रहा है। यदा- कदा वह यह भी कहते थे कि अधिसंख्यक समस्याएँ, विकृति एवं विकार आध्यात्मिक जीवन दृष्टि के अभाव में पनपते हैं। यदि पीड़ित व्यक्ति की जीवन दृष्टि सुधार दी जाय तो समस्या का समाधान हो जाता है। इस क्रम में एक बात महत्त्वपूर्ण है। वह यह कि जो पीड़ित व्यक्ति होता है, उसकी सोच- विचार को सही दिशा देना भी आसान काम नहीं है। क्योंकि निरन्तर पीड़ा सहते रहने के कारण उसमें संकल्प एवं साहस चुक जाते हैं। ऐसी अवस्था में उसे अतिरिक्त ऊर्जा के अनुदान की जरूरत पड़ती है। ऐसा होने पर ही वह अपने बिखरे जीवन को फिर से संवार पाता है।

स्थिति जो भी हो किन्तु इतना सच है कि आध्यात्मिक चिकित्सक को मानवीय चेतना का मर्मज्ञ होने के साथ आध्यात्मिक ऊर्जा का अजस्र स्रोत होना चाहिए। उसकी बौद्धिक पारदर्शिता, सघन भाव प्रवणता एवं अन्तरात्मा में उफनते आध्यात्मिक शक्ति के महासागर ही उसे सफल आध्यात्मिक चिकित्सक बनाते हैं। अपनी इस सामर्थ्य के बलबूते ही वह अपने रोगी के रोग निदान एवं समाधान में सक्षम हो पाता है।

 
    

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